जय माँ चामुण्डा !
🙏🚩 जय माँ चामुण्डा ! जय माँ मङ्गला !! जय माँ दुर्गा!!! 🙏🚩
जय माँ चामुण्डा! जय माँ मङ्गला!! जय माँ दुर्गा!!!
महा शक्तिपीठ — माँ चामुण्डा भगवती महात्म्य 
मिथिला पूरे प्रदेश सहित देश में विभिन्न महा शक्तिपीठों के लिए प्रसिद्ध रहा है। इसी कड़ी में पचही गांव स्थित चामुण्डा स्थान का विशेष स्थान है। श्रद्धा, भक्ति, आस्था एवं समर्पण का प्रतीक है पचही गांव का महा शक्तिपीठ चामुण्डा स्थान। मिथिला में प्रसिद्ध इस महा शक्तिपीठ में मूर्ति नहीं बल्कि समाधि की होती है पूजा। झंझारपुर-मधेपुर (NH527A) मुख्य सड़क किनारे पचही गांव में अवस्थित है यह स्थान।
चामुण्डा स्थान के आसपास का प्राकृतिक दृश्य बड़ा ही मनोरम है। प्रातःकाल सूर्य की लालिमा जब मंदिर की गुम्बद पर पड़ती है तो एक बड़ा ही मनोहारी दृश्य उत्पन्न होता है। इस पवित्र व अलौकिक स्थल में आस्था अर्पित करने श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां की प्राकृतिक-सौंदर्य बरबस ही श्रद्धालुओं को मनमोह लेता है। इस स्थान पर हालांकि सालोभर आस्था निवेदित करने श्रद्धालु पहुंचते हैं। लेकिन, शारदीय एव वासंती नवरात्रा तथा महादेव पूजा के दौरान यहां हजारों कुमारी-कन्याओं को भोजन कराया जाता है। प्रतिवर्ष कोजागरा के बाद यहां पांच दिवसीय महादेव पूजनोत्सव का आयोजन किया जाता है। कहा जाता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व गांव में यहां अवतरित हुई थीं। नेपाल राष्ट्र सहित बिहार के विभिन्न भागों से श्रद्धालु यहां उपासना करने आते हैं।
चामुण्डा स्थान की चर्चा आध्यात्मिक पुस्तकों में भी उल्लिखित है। पुस्तकों के अनुसार, मुगल शासन काल में जनक नंदिनी सीता की पावन भूमि मिथिला की हिंदुस्थली में अवतरित हुए साधकों में वर्धमान झा उपाध्याय नाम के न्यायशास्त्र के विद्वान पचही गांव में थे। उन्हें चामुण्डा, जयमंगला एवं दुर्गा मां की तीन पुत्रियां थीं। कहा जाता है कि एक दिन तीनों बहनें गांव से दक्षिण बगीचे में फूल चुन रही थीं। उसी वक्त मुगल सेना की टोली उस रास्ते से गुजर रहा था। सेनाओं के पैरोंचित ध्वनि का प्रभाव पड़ते देख बड़ी बहन चामुण्डा ने धरती माता से प्रार्थना की। इसके बाद तत्काल उस स्थल पर धरती फट गई और तीनों बहनें उसमें समा गईं। ग्रामीणों और पिता को मिले स्वप्न के बाद यह स्थान महा शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हो गया। मिथिला दर्पण, मिथिला तीर्थ प्रकाश एवं आध्यात्मिक पत्रिका कल्याण के 1948 के जनवरी अंक सहित करीब डेढ़ दर्जन पुस्तकों में वर्णित तथ्यों के अनुसार वृद्धावस्था में वर्धमान झा उपाध्याय को गंगा स्नान की इच्छा हुई। इसके बाद उन्होंने अपने पुत्री का स्मरण किया। तत्पश्चात इसराईन चौड़ में गंगा अवतरित हुई। चार सौ वर्ष बाद भी आज तक पचही इसराईन चौड़ का पानी नहीं सूखा है। करीब 50 वर्ष पूर्व तो इस महा शक्तिपीठ के प्रांगण में एक अद्भुत घटना घटी। प्रांगण में बरगद का एक पुराना वृक्ष था। ग्रामीणों ने उस वृक्ष को बेचने की योजना बनाई और एक ग्राहक के हाथों बेच दिया। ग्राहक ने इस वृक्ष को काट तो दिया, लेकिन दूसरे दिन जब वह आया तो लकड़ी के बदले पहले की तरह वृक्ष था। वह भागा-भागा ग्रामीणों के पास पहुँचा, ग्रामीणों के माध्यम से यह बात दूर-दूर तक फैली। दूर-दूर के लोग उस वृक्ष को देखने आए। इस बात से लोगों की आस्था तो और दृढ़ हो गई। दरभंगा महाराज स्वर्गीय कामेश्वर सिंह भी यहां आस्था अर्पित करने कई बार पहुंचे थे। ऐसी मान्यता है कि पचही चामुण्डा स्थान में पूजा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।